लठ्ठ वाली मनाऊंगी होली ,इंद्रदेव त्रिवेदी
मुझको रोको न अबकि सहजनवां
जी भरकर मनाऊंगी होली।
गांव वाली मनाऊं न होली,
ब्रज वाली मनाऊंगी होली।।
ऐसी पिचकारी मुझको मंगा दे
प्रेम के रंग जिसमें भरे हों।
प्रेम के रंग सबको भिगोकर,
अपने मन की मनाऊंगी होली।।
मुझको रोको न.............
गीत ऐसे मुझे तुम सुनाना
फागुनी गीत होते रंगीले।
शब्द मीरा के जिसमें भरे वो,
कृष्ण वाली मनाऊंगी होली।।
मुझको रोको न..................
रागिनी ऐसी छेड़ो लवों से
कृष्ण की बंसुरी बजती जैसे।
बंसुरी की मैं धुन पर थिरककर,
आज दिन भर मनाऊंगी होली।।
मुझको रोको न...................
कृष्ण तेरा धरे रूप आयें
अब खेलूंगी जी भर के होली।
सावधानी सी इतनी रखना,
लठ्ठ वाली मनाऊंगी होली।।
मुझको रोको न ................. इंद्र देव त्रिवेदी, बिहारीपुर खत्रीयान, बरेली
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