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श्रावण में बरेली बन जाती है शिवभक्ति की जीवंत राजधानी। विशेष लेख : वरिष्ठ पत्रकार मुकेश तिवारी की कलम से

श्रावण में बरेली बन जाती है शिवभक्ति की जीवंत राजधानी। विशेष लेख : वरिष्ठ पत्रकार मुकेश तिवारी की कलम से


मुकेश तिवारी वरिष्ठ पत्रकार
बरेली रूबरू बरेली। नाथ परंपरा, प्राचीन शिवालय, कांवड़ यात्रा और लोकआस्था का जीवंत महोत्सव
भारतीय सनातन संस्कृति में यदि कोई मास भक्ति, तप, संयम और आत्मशुद्धि का प्रतीक माना गया है, तो वह श्रावण मास है। 


यह केवल पंचांग का एक महीना नहीं, बल्कि भगवान शिव की अनंत कृपा का उत्सव है। शास्त्रों में कहा गया है— "श्रावणे मासि यः भक्त्या शंकरं पूजयेत् नरः। सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोकं स गच्छति॥" अर्थात जो श्रद्धा और समर्पण के साथ श्रावण मास में भगवान शंकर की आराधना करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर शिवकृपा का अधिकारी बनता है।


श्रावण आते ही उत्तर प्रदेश की नाथ नगरी बरेली का स्वरूप बदल जाता है। यहां की गलियों से लेकर प्रमुख मार्गों तक "हर-हर महादेव" और "बोल बम" के जयघोष गूंजने लगते हैं। 


मंदिरों की घंटियों की मधुर ध्वनि, वैदिक मंत्रोच्चार, रुद्राभिषेक की पवित्र धारा और शिवभक्तों की अनवरत आस्था पूरे नगर को शिवमय बना देती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं कैलाश की आध्यात्मिक अनुभूति धरती पर उतर आई हो।


नाथ नगरी की आध्यात्मिक पहचान
बरेली केवल ऐतिहासिक और सांस्कृतिक नगर नहीं है, बल्कि यह नाथ संप्रदाय की महत्वपूर्ण साधना-स्थली भी है। सदियों से यहां योग, तप और शिव साधना की परंपरा जीवित रही है। 

गुरु गोरखनाथ और नाथ योगियों की साधना का प्रभाव आज भी यहां की धार्मिक संस्कृति में स्पष्ट दिखाई देता है। यही कारण है कि बरेली को श्रद्धापूर्वक "नाथ नगरी" कहा जाता है।


नाथ परंपरा का मूल संदेश है— आत्मसंयम, योग, साधना और शिवत्व की प्राप्ति। यही दर्शन श्रावण मास में और अधिक सजीव हो उठता है। जब भक्त शिवलिंग पर जल अर्पित करता है, तब वह केवल पूजा नहीं करता, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, क्रोध और मोह का भी विसर्जन करता है।


शिवसूत्र में कहा गया है— "चैतन्यमात्मा" अर्थात चेतना ही आत्मा है। भगवान शिव उसी परम चेतना के प्रतीक हैं। श्रावण इसी चेतना से जुड़ने का अवसर प्रदान करता है।


प्राचीन शिवालयों में उमड़ती अटूट आस्था
श्रावण मास में बरेली के प्राचीन शिवालय श्रद्धा के विराट केंद्र बन जाते हैं। अलखनाथ मंदिर में प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु जलाभिषेक और रुद्राभिषेक के लिए पहुंचते हैं। त्रिवटीनाथ, तपेश्वरनाथ, धोपेश्वरनाथ, मढ़ीनाथ, वनखंडीनाथ, पशुपतिनाथ तथा वनखंडी महादेव जैसे प्राचीन मंदिरों में सुबह से देर रात तक श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।


शिवलिंग पर गंगाजल, दूध, दही, शहद, घृत, बेलपत्र, धतूरा, आक और भस्म अर्पित करने की परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति और जीवन के प्रति कृतज्ञता का भी प्रतीक है। बेलपत्र की तीन पत्तियां शिव के त्रिनेत्र, त्रिगुण और त्रिदेव का प्रतीक मानी जाती हैं, जबकि धतूरा और भस्म यह संदेश देते हैं कि शिव वैभव नहीं, सरलता और विरक्ति के देव हैं।


कांवड़ यात्रा : आस्था, तप और सेवा का संगम
श्रावण का सबसे प्रेरक और भावनात्मक पक्ष कांवड़ यात्रा है। बरेली सहित आसपास के हजारों श्रद्धालु हरिद्वार, गढ़मुक्तेश्वर, कछला घाट और श्रीरामगंगा जैसे पवित्र तीर्थों से गंगाजल लेकर कई किलोमीटर की पदयात्रा करते हैं। 

उनके कंधों पर सजी कांवड़ केवल जल का पात्र नहीं होती, बल्कि श्रद्धा, अनुशासन और संकल्प का प्रतीक होती है।


भगवा वस्त्रों में सजे कांवड़ियों के जत्थे जब "बोल बम" और "हर-हर महादेव" का उद्घोष करते हुए नगर में प्रवेश करते हैं, तो पूरा वातावरण भक्तिरस से सराबोर हो उठता है। 

जगह-जगह सामाजिक और धार्मिक संगठन निःशुल्क भंडारे, जलसेवा, चिकित्सा शिविर और विश्राम स्थलों का आयोजन करते हैं। यह परंपरा भारतीय संस्कृति के उस महान आदर्श को जीवंत करती है— "नर सेवा ही नारायण सेवा है।"

महाभारत में कहा गया है— "परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीड़नम्।" अर्थात परोपकार ही पुण्य है और दूसरों को कष्ट देना पाप। श्रावण में सेवा का यही भाव समाज को जोड़ता है।

श्रावण सोमवार : भक्ति का विशेष पर्व
श्रावण के प्रत्येक सोमवार का विशेष महत्व है। प्रातः ब्रह्ममुहूर्त से ही मंदिरों में श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग जाती हैं। रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय मंत्र का जाप, शिव महापुराण कथा, भजन-कीर्तन, सामूहिक आरती और विशेष श्रृंगार से मंदिरों का वातावरण अलौकिक बन जाता है।


महिलाएं मंगला गौरी व्रत रखकर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। युवा शिव आराधना और कांवड़ सेवा में बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं। बच्चे अपने माता-पिता के साथ मंदिर जाकर भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपराओं से परिचित होते हैं। इस प्रकार श्रावण केवल पूजा का नहीं, बल्कि पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक मूल्यों के हस्तांतरण का भी पर्व है।


शिव : केवल देव नहीं, जीवन-दर्शन हैं
भगवान शिव का स्वरूप जितना सरल है, उतना ही गूढ़ भी है। उनके मस्तक पर चंद्रमा शीतलता का, जटाओं से बहती गंगा पवित्रता का, कंठ का विष धैर्य का, डमरू सृष्टि की लय का और त्रिशूल सत्य, ज्ञान तथा शक्ति का प्रतीक है। वे हमें सिखाते हैं कि विपरीत परिस्थितियों में भी संतुलन बनाए रखना ही वास्तविक तप है।

उपनिषदों का वाक्य— "शिवो भूत्वा शिवं यजेत्" यह संदेश देता है कि शिव की उपासना तभी सार्थक है, जब मनुष्य स्वयं भी करुणा, सत्य, क्षमा और संयम जैसे शिवतत्त्व को अपने जीवन में उतारे।


शिवपुराण में कहा गया है— "ज्ञानं महेश्वरादिच्छेत्" अर्थात वास्तविक ज्ञान और आत्मबोध भगवान महेश्वर की कृपा से प्राप्त होता है। यही कारण है कि श्रावण मास केवल बाहरी पूजा का नहीं, बल्कि आत्ममंथन और आत्मशुद्धि का भी अवसर माना गया है।

प्रकृति और शिव का अद्भुत संबंध
श्रावण वर्षा ऋतु का समय है। धरती हरियाली की चादर ओढ़ लेती है। नदियां कल-कल बहती हैं, वृक्ष नवजीवन से भर उठते हैं और वातावरण शीतल हो जाता है। 

शिव स्वयं प्रकृति के आराध्य देव हैं। पर्वत उनका निवास है, नंदी उनका वाहन है, सर्प उनका आभूषण है और गंगा उनकी जटाओं में विराजती हैं। इसलिए श्रावण का संदेश केवल ईश्वर भक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण और पर्यावरण संतुलन का भी है।


आज जब पर्यावरण संकट विश्व के सामने चुनौती बन चुका है, तब शिव का यह स्वरूप हमें प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनने की प्रेरणा देता है।
सनातन संस्कृति की जीवंत धरोहर
आधुनिक जीवन की भागदौड़, तकनीक और बदलती जीवनशैली के बीच भी बरेली में श्रावण की आध्यात्मिक परंपरा पूरी गरिमा और श्रद्धा के साथ जीवित है। यहां की नाथ परंपरा, प्राचीन शिवालय, कांवड़ यात्रा, धार्मिक आयोजन और समाज की सेवा-भावना यह सिद्ध करते हैं कि सनातन संस्कृति केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान की जीवंत चेतना है।


श्रावण हमें यह सिखाता है कि जीवन का वास्तविक वैभव धन, पद और प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि संयम, सेवा, करुणा, प्रकृति प्रेम और ईश्वर के प्रति समर्पण में है। यही कारण है कि जब श्रावण में नाथ नगरी बरेली "हर-हर महादेव" के उद्घोष से गूंजती है, तब यह केवल धार्मिक उत्सव नहीं होता, बल्कि भारतीय संस्कृति, लोकआस्था और अध्यात्म की उस अनश्वर ज्योति का उत्सव बन जाता है, जो सदियों से मानवता को प्रकाश देती आ रही है।


वास्तव में, श्रावण में शिवमय होती नाथ नगरी बरेली केवल एक नगर नहीं रह जाती, बल्कि वह श्रद्धा, साधना, सेवा और सनातन संस्कृति के दिव्य संगम के रूप में सम्पूर्ण भारत की आध्यात्मिक चेतना का सजीव प्रतीक बन उठती है।
वरिष्ठ पत्रकार मुकेश तिवारी


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