Bareilly News: पशु स्वास्थ्य, उत्पादन में सुधार को आई वी आर आई द्वारा विकसित नवीनतम प्रौद्योगिकियों की जानकारी दी।
बरेली रूबरू बरेली। हिमाचल प्रदेश के राज्य पशुपालन विभाग के पशु चिकित्साधिकारियों के लिए “पशु रोगों और उत्पादन में अनुसंधान प्रगति” विषय पर कार्यशाला में पशु चिकित्सा आधिकारियों को पशु स्वास्थ्य और उत्पादन में सुधार के लिए संस्थान द्वारा विकसित नवीनतम प्रौद्योगिकियों की जानकारी दी गई।
सह- इंटरफ़ेस मीट में आईसीएआर- भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, इज्ज़तनगर (यू.पी.) एवं आई वी आर आई, रीजनल स्टेशन पालमपुर (हिमाचल प्रदेश) द्वारा हाइब्रिड मोड में कार्यशाला को किया गया।
इस कार्यशाला में पशु चिकित्सा आधिकारियों को पशु स्वास्थ्य और उत्पादन में सुधार के लिए संस्थान द्वारा विकसित नवीनतम प्रौद्योगिकियों के साथ साथ पशु- स्वास्थ्य से सम्बंधित विभिन्न विषयों पर वैज्ञानिक जानकारियाँ प्रदान करने के लिए व्याख्यान भी दिया गया। इस कार्यक्रम में कुल 326 प्रतिभागियों ने सहभागिता की।
डॉ. संजीव कुमार धीमन, निदेशक, पशुपालन विभाग, शिमला, हिमाचल प्रदेश ने इस तरह की कार्यशाला एवं इंटरफेस आयोजित करने के लिए आई वी आर आई की सराहना की, जो अनुसंधान संस्थान और अंतिम उपयोगकर्ता के बीच के अंतर को कम करने में सहायक होगा।
उन्होंने राज्य के पशुओं में होने वाले वाले विभिन्न रोगों जैसे की अफ्रीकन सवाईन फीवर, खुरपका-मुहपका, पीपीआर आदि से होने वाले आर्थिक नुकसान के बारे में बताते हुए इनके वैज्ञानिक प्रबंधन, शीघ्र पहचान हेतु आई वी आर आई की तकनीकी भूमिका को रेखांकित किया।
उन्होंने कहा आईवीआरआई द्वारा विकसित तकनीकों से हमारे पशु चिकित्सा अधिकारियों को प्रक्षेत्र की समस्याओं के निवारण मे मदद मिली है। उन्होंने फुटराट और माइकोप्लाज्मा टीके को विकास के संस्थान को कार्य करने की आवश्यकता पर बल दिया और स्टार्टअप के विकास के लिए भी सहयोग देने की अपेक्षा जाहिर की. उन्होंने परस्पर सहयोग तथा वर्तमान परिस्थितयों पर समग्र स्वास्थ्य की दिशा में कार्य करने की आवश्यकता पर बल दिया।
उन्होंने कहा कि वर्तमान बैठक, विभाग के पशु चिकित्सा अधिकारियों को निदान और उपचार में नवीनतम प्रगति के साथ अपने ज्ञान को ताजा करने का एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करेगा।
डॉ त्रिवेणी दत्त, निदेशक, आई वी आर आई ने अपने सम्बोधन में कहा कि संस्थान ने अपने ऐतिहासिक 135 वर्ष में कई पशु रोगों का उन्मूलन किया है जिसके लिए भारत सरकार द्वारा डाक टिकट भी जारी किया गया है।
संस्थान द्वारा 13 टीकों सहित 47 प्रौद्योगिकियों को 163 उद्योगों को हस्तांतरित किया गया है। इसके अतिरिक्त संस्थान द्वारा 64 आईसीटी टूल विकसित किये है जिनका प्रयोग 134 देशों में 4 लाख से अधिक लोगों द्वारा किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त संस्थान ने पशुओं की चार नहत्वपूर्ण बीमारियों का उन्मूलन किया है।
संस्थान ज़ू सफारी एवं रिस्कयु सेंटर, वन्य प्राणी केंद्र को समय समय पर नेशनल एडवाइजरी भी जारी करता है। इसके अतिरिक्त संस्थान ने आई सी टी टूल विकसित किये हैँ जो हमारे पशुचिकित्साधिकारियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।
इसके अतिरिक्त डा. त्रिवेणी दत ने संस्थान के सम- विश्वविद्यालय द्वारा विभिन्न व्यावसायिक पाठ्यक्रमों और ऑनलाइन डिप्लोमा पाठ्यक्रमों तथा पाठ्यक्रमों के रूप में की गयी विभिन्न शैक्षणिक पहलों के बारे में भी जानकारी दी जिनका उपयोग पशुपालन में काम कर रहे विषय विषेशज्ञों की क्षमता निमार्ण के लिए किया जा सकता है।
इस अवसर पर संयुक्त निदेशक (प्रसार शिक्षा), डॉ. रूपसी तिवारी ने सभी गणमान्य व्यक्तियों और प्रतिभागियों का स्वागत किया।
इस अवसर पर उन्होंने पिछली इंटरफेस बैठक में चिन्हित क्षेत्रों में आई वी आर आई द्वारा की गई कार्रवाई का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया। उन्होने कहा कि प्रतिभागियों से एकत्र की गई जानकारी में हीमोप्रोटोज़ून रोगों के निदान हेतु किट का विकास, परजीवी एवं उभरते रोगों के लिए प्रभावी टीकों का निर्माण,आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रोगों के लिए मुह से देने योग्य टीकाकरण विकसित करना तथा एफएमडी टीकाकरण का गर्भवती पशुओं एवं बांझपन पर प्रभाव,फील्ड स्तर पर रोगों के त्वरित निदान के लिए किट, कम लागत वाली, फील्ड-अनुकूल एस्ट्रस (हीट) एवं गर्भधारण जाँच किट, वैकल्पिक चारा संसाधन जैसे कृषि-औद्योगिक उप-उत्पाद एवं हाइड्रोपोनिक चारा, पशु उत्पादों की शेल्फ लाइफ (भंडारण अवधि) बढ़ाने की तकनीकें आदि की आवश्यकता बताई गई है।
इसके साथ ही प्रतिभागियों ने ईबीएच एवं सेलेनियम की कमी, मास्टाइटिस (थनैला) के लिए सस्ती और प्रभावी उपचार पद्धति तथा लैंटाना विषाक्तता का समाधान, अधर पैपिलोमैटोसिस, क्रॉसब्रेड गायों में एस्ट्रस (हीट) में देरी एवं बांझपन की समस्या, गायों के ट्रांजिशन पीरियड पर अनुसंधान, बड़े पशुओं में मूत्र मार्ग संक्रमण का शीघ्र निदान, अयनों की फाइब्रोसिस, पारंपरिक पशु चिकित्सा पद्धतियाँ आदि विषयों पर संस्थान द्वारा अनुसंधान करने के आवश्यकता व्यक्त की.
प्रतिभागियों ने बताया की रिफ्रेशमेंट कोर्स की कमी, विभिन्न बीमारियों के लिए समान लक्षण जैसी समस्यायें भी पशु चिकित्सकों के लिए महत्वपूर्ण है।
इसके अतिरिक्त प्रतिभागियों ने पोल्ट्री फार्मिंग एवं हैचरी प्रबंधन, बकरी पालन, प्रजनन सांडों का स्वास्थ्य प्रबंधन, सार्वजनिक स्वास्थ्य महत्व के रोग, पशु उत्पादों का मूल्य संवर्धन, उद्यमिता विकास, पोस्टमार्टम एवं क्लिनिकल पैथोलॉजी, हैंड्स-ऑन प्रशिक्षण: अल्ट्रासोनोग्राफी, एक्स-रे, मस्टाइटिस (थनैला) प्रबंधन, रोग निवारक पशु-चिकित्सा पद्धतियाँ, बांझपन की समस्या का समाधान पर प्रशिक्षण प्राप्त करने की आवश्यकता जतायी।
इस अवसर पर दो तकनीकी सत्रों हुए। प्रथम सत्र संस्थान के संयुक्त निदेशक शोध डा. एस.के. सिंह की अध्यक्षता में संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. बबलू कुमार, ने आईवीआरआई तकनीकें, पशु प्रजनन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. एम.एच. खान ने गौवंशीय प्रजनन स्वास्थ्य में सुधार (बांझपन प्रबंधन), डॉ. के.के. रजक, प्रधान वैज्ञानिक, आईवीआरआई, इज्जतनगर ने छोटे जुगाली पशुओं के आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रोगों के टीके एवं टीकाकरण तथा संस्थान के क्षेत्रीय केंद्र, पालमपुर की वैज्ञानिक डॉ. अजयता रियालच ने हिमाचल प्रदेश में छोटे जुगाली पशुओं के परजीवी रोग एवं उनका नियंत्रण पर पर जानकारी प्रदान की गयी।
दूसरे सत्र में पशु चिकित्सकों के द्वारा पूछे गये विभिन्न प्रश्नों जैसे की बाझपन और मद-चक्र से सम्मबंधित विकार, क्या गर्भावस्था में टीके दिए जा सकते हैं, फैसिओला परजीवी का उपचार और प्रबंधन कैसे करें, छोटे- पशुओं में माइकोप्लाज्मा का टीके विकसित करने के जरुरत आदि का उत्तर संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा दिया गया।
इस कार्यशाला सह-इंटरफ़ेस मीट में हुए विचार –विमर्श में संस्थान द्वारा फुटराट और माइकोप्लाज्मा का टीके का विकास के लिए हो रहे कार्यों में तेजी लाने, आहार की आवश्यकता का निर्धारण करने हेतु मोबाइल एप्प विकसित करने, और पहाड़ी क्षेत्रों के अनुकूल पशु उठाने का उपकरण विकसित करने का निर्णय लिया गया.
कार्यक्रम का संचालन औषधि विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ अखिलेश कुमार द्वारा किया गया जबकि धन्यवाद ज्ञापन पालमपुर केंद्र के वैज्ञानिक डा. अज्यता रियालच द्वारा किया गया इस अवसर पर संस्थान के संयुक्त निदेशक, शोध डा. एस .के. सिंह, संयुक्त निदेशक, शैक्षणिक डा. एस.के. मेंदीरत्ता, संयुक्त निदेशक केडराड, डॉ सोहिनी डे, मुक्तेश्वर परिशर के संयुक्त निदेशक डा. यशपाल मलिक, बंगलूरू परिसर के संयुक्त निदेशक डा. पल्लव चैधरी, , तथा कोलकाता स्टेशन के प्रभारी डा. अर्नब सेन तथा पालमपुर केन्द्र के प्रभारी डॉ गोरखमल, डॉ. बीरबल सिंह, डॉ. रिंकू शर्मा, डॉ. बीरबल, डॉ. गौरी जयरथ आदि मौजूद रहे । निर्भय सक्सेना
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