पत्रकार हित मे लगे रहते है बरेली के वरिष्ठ पत्रकार निर्भय सक्सेना
जहां तक मुझे ध्यान है कि हांड़ कपकंपाती ठंड में दिसंबर माह में 1975 को ‘दैनिक विश्व मानव’ में मेरी पहली मुलाकात भाई निर्भय सक्सेना पत्रकार से हुई थी। यह कहना है आकाशवाणी के बरेली पत्रकार जनार्दन आचार्य का । तब आजकल जैसा कम्प्यूटर युग नहीं था। सभी खबरें पहले कागज पर लिखी जाती थी, फिर कंपोज होती थी। निर्भय जी डेस्क पर खबरे लिखने में तल्लीन थे। खबर पूरी करने के बाद मेरी ओर मुखातिब हुए, परिचय पूरा हुआ उन्होंने मुझसे बरेली कालेज छात्र संघ से संबंधित कुछ खास बातें पूछी, फिर अयूब खां चोराहे, जो अब पटेल चोक के नाम से जाना जाता है, वहां चाय के ठेले पर ले जाकर चाय पिलाई। तब से आज तक इन 45 वर्षों से हमारा मिलन लगातार बढ़ते हुए पारिवारिक मित्रता पर पहुंच गया। सन् 2013 में इलाहाबाद में हुए उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट एसोसिएशन उपजा के इलाहाबाद में हुए प्रादेशिक चुनाव में निर्भय सक्सेना प्रदेश उपाध्यक्ष के पद पर विजयी हुए तो दूसरी ओर मैंने प्रदेश मंत्री पद पर सफलता प्राप्त की। पत्रकार निर्भय जी यथानाम तथागुण को चरितार्थ करते हैं। अनेकों वीआइपी की प्रेस वार्ताओं में निर्भय जी निर्भीक होकर प्रश्न पूछते थे तो अनेकों मंत्रियों/अधिकारियों द्वारा उसका उत्तर देते नहीं बनता था। कई बंगले झांकते तो कई तमतमा जाते थे। क्योंकि निर्भय जी सटीक सवाल पूछते थे। बरेली के वरिष्ठ पत्रकार के रूप में जाने माने निर्भय सक्सेना जी ‘दैनिक अमर उजाला’, ‘दैनिक विश्व मानव’, ‘दैनिक विश्वामित्र’, दैनिक आज तथा ‘दैनिक जागरण’ सहित अन्य कई मासिक व साप्ताहिक सामचार पत्रों से जुड़े रहे। यू. पी. जर्नलिस्ट एसोसिऐशन के बरेली जिला इकाई में सदैव सक्रिय रहे। बरेली में चार बार उत्तर प्रदेश जर्नलिस्टएसोसिऐशन के प्रांतीय अधिवेशन आयोजित कराये। दूसरे अधिवेशन में तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री वीर बहादुर सिंह आये। निर्भय जी ने बरेली में उपजा कार्यालय की स्थापना व प्रियदर्शिनी नगर में पत्रकार कालोनी की स्थापना में बढ़ चढ़कर भाग लिया। शहर के बीचोबीच कोतवाली के सामने न्यू सुभाष मार्केट स्थित सिंघल लाइब्रेरी के अलग कक्ष में उपजा कार्यालय के विकास हेतु उ.प्र. के तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. डी. तिवारी व हरियाणा के मुख्यमंत्री देवी लाल जी से आर्थिक सहयोग दिलाया। इतना ही नहीं लगन लगाकर उपजा कार्यालय में उस समय के वरिष्ठ पत्रकार कुलनीप नैय्यर, राजीव शुक्ला, राहुल देव, कमलेश्वर, रामबहादुर राय, महेश्वर दयाल गंगवार, वी.के. सुभाष, वीरेंद्र सिंह, अजय कुमार तथा अच्युतानन्द मिश्रा, दादा पीयुष कांति राय, सांसद कपित वर्मा, पी.वी. वर्मा सहित अनेकों ख्यातिप्राप्त पत्रकारों को बुलाया तथा उनका मार्गदर्शन लिया।
वरिष्ठ पत्रकार निर्भय सक्सेना को मैंने सदैव ही पूर्ण गतिशील देखा है। उन्होंने पत्रकारों के संगठन को नये आयाम दिये सदैव ही संगठन को मजबूती के साथ आगे बढ़ाने में कमर्ठता दिखायी है। उनमें कर्मठता, लगनशीलता, सादगी, ईमानदारी, भाईचारा एवं अपनत्व की भावना कूट-कूट कर भरी हुई दिखायी देती है। अहम से दूर सदैव ही चोथे स्तंभ को मजबूत करते हुए उसके प्रकाश को बढ़ाने में अभी भी गतिशील है। मेरी प्रभु से प्रार्थना है कि वो उन्हें और अधिक शक्ति दे, वे स्वस्थ रहे और अपने प्रकाश से आने वाली पीढ़ी को मार्गदर्शन देते रहे यही मेरी शुभकामनाएं हैं।
जनार्दन आचार्य 26, सौदागरान बरेली मो. 9760005719 आकाशवाणी एवं दूरदर्शन में संवाददाता
जैसा नाम वैसा व्यवहार भी है निर्भय सक्सेना का : दिनेश पवन
ये बात काफी हद तक ठीक है कि नाम ही आपके व्यक्तित्व की प्रथम काल्पनिक पहचान होता है। कोई नाम सुनते ही हमारी कल्पना में एक प्रतिबिम्ब उभरता है जिसके माध्यम से हम यह तय कर लेते हैं कि इस नाम वाला व्यक्ति इस तरह का होगा। नाम से ही प्रायः यह पता चल जाता है कि व्यक्ति का आचार-व्यवहार कैसा होगा। ये बात हमेशा हर नाम वाले पर पूरी तरह खरी उतरती हो ऐसा भी नहीं है पर काफी हद तक तो ठीक होती ही है। दैनिक जागरण, बरेली के पत्रकार दिनेश पवन का कम से कम यही मानना है। दिनेश पवन कहते है मेरे अनेक परिचित, मित्र हैं जिनका आचरण कामोवेश उनके नाम के अनुकूल ही है। इन्हीं में से एक नाम है निर्भय जी सक्सेना। एक बार बोलने लगे यारे मरे नाम के आगे जी मत जोड़ा करो। ऐसा लगता है जैसे हम संघ के स्वयंसेवक हों और आप हमें शाखा में चलने को बुला रहे हांे। हम भी कहां चूकने वाले थे। बोल दिया-हमारा जी, आरएसएस वाला नहीं यह तो ‘जीनियस’ का शार्टफार्म है। हम आपको जीनियस मानते हैं। यह जान कर कुछ लोग आपकी टांग खिंचाई न करें इसलिए जी से ही काम चला लेते हैं। बात आई-गई हो गई। पर आज जब बात निर्भय जी का शब्द चित्र बनाने की आई तो लगा मजाक में कहीं गई ये बात वास्तव में कितनी गम्भीरता लिए हुए है। निर्भय जी के व्यवहार, व्यक्तित्व, संबंध, सम्मान पर कल्पना में बनी फिल्म का फ्लैशबैक देखें तो एक अलग ही खाका तैयार होता है। निर्भय जी एक ऐसे व्यक्ति है जो सही मायने में दोस्तों के दोस्त हैं। दोस्त की खुशी में शामिल होने से भले ही चूक जायें पर मुसीबत के दौर में आप उन्हें हर वक्त अपने साथ पायेंगे। काम कैसा भी हो उसे करने में न झिझक, न झंझट और न ही कोई भय। दोस्ती निभाने में पूरी तरह सक्षम हैं निर्भय सक्सेना। जो काम करने से पहले और लोगों को कई-कई बार सोचना पड़ता है निर्भय जी उसका वीड़ा उठाने में एक पल नहीं लगाते। मुझे याद आता है एक पत्रकार मित्र को एक लड़की से प्रेम हो गया। बात जब साथ-साथ जीने मरने तक पहुंची तो निर्भय जी ने सारे संकोच त्यागकर उनके संबंधों को गठबंधन तक पहुंचाने में दिन-रात एक कर दिया।
एक अन्य व्यापारी मित्र हैं। उनके पड़ोसी से किसी बात पर झगड़ा हो गया। बहुतों को बुलाया पर लगभग सभी ने किसी न किसी बहाने से कन्नी काट ली। एक मात्र निर्भय जी थे जो साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़े रहे। उनके सपोर्ट का ही परिणाम रहा कि विवाद का अंत काफी हद तक उनके पक्ष में ही हो गया। कहा तो यहां तक जाता है कि लोगों के काम आने की धुन ने ही निर्भय जी को पत्रकार बना दिया। नहीं अच्छा खासा तेल का कारखाना शुरू किया था। यदि बिजनेस पर ध्यान दिया होता तो आज लाखों में खेल रहे होते। पर ऐसा नहीं हो पाया क्योंकि उनके सिर पर दोस्तों का दोस्त बनने का शौक सवार था। कारखाना चले, न चले पर लोगों की बेहतरी करने के लिए कलम चलती रहनी चाहिए। घर का सामान भले ही न आये पर पत्रकार संगठन ;उपजाद्ध की गतिविधि में अवरोध नहीं आना चाहिए। घर में भले ही आर्थिक तंगी चल रही हो पर यदि उपजा एवं नेशनल यूनियन आॅफ जर्नलिस्ट के सम्मेलन में जाना है तो हर हाल में जाना ही जाना है। कितने ही जरूरी काम के लिए पैसे जोड़ कर रखे गए हों पर पत्रकार सम्मेलन में जाने के लिए खर्च कर देने में निर्भय जी को कभी कोई झिझक नहीं होती। साथी पत्रकारों का भी टिकट अपनी जेब से ले आयेंगे भले ही ऐन मौके पर वह पैसे दें या न दे। हर बार एक ही बात कहते हैं, पैसे की चिंता न करो तुम तो बस चलने को हां करो। टिकट में करा देता हूूं। टिकट कटा कर मुस्कराते हुए कहेंगे- लो भई हो गई यात्रा पक्की। यात्रा के दौरान किसी साथी को कोई कष्ट न हो इसका पूरा ध्यान रखना भी निर्भय जी कभी नहीं भूलते। उपजा का सम्मेलन इलाहाबाद, बनारस या मानेसर में हो या ऊंकारेश्वर में खास बात ये है साथियों को हर सुविधा दिलाना निर्भय जी की पहली जिम्मेदारी होती है। खास बात ये हैं कि सहयोग की भावना उनमें कूट-कूट कर भरी हुई है। अपनायत का दिखावा तो बहुत लोग करते हैं पर वास्तव में अपनापन क्या होता है इसे व्यक्ति अच्छी तरह जानता है जो एक बार भी निर्भय जी के सम्पर्क में आ जाता है। मैंने इसका प्रत्यक्ष अनुभव तब किया जब मुझे हार्ट की प्राब्लम के चलते एसआरएमएस में भर्ती कराया गया। उस समय निर्भय जी शहर में नहीं थे। दो-तीन दिन बाद लौटे तो घर आये। पूछा ईएसआईसी से कैशलैस स्कीम का लाभ मिला या नहीं। हमने कहा, ‘रिटारयरमेंट के बाद कौन पूछता है।’ बोले- नहीं यार कोई पूछे न पूछे सरकार जरूर पूछती है। और बिना एक पल गंवाये कागजात तैयार करने में लग गए । ये बिल, वो रसीद, ये एप्लीकेशन, वो फोटोस्टेट, यहां दस्तखत, वहां लेटर पोस्टिंग। यानि सारा सिर दर्द अपने ऊपर ले लिया। अक्सर हम अनखना जाते पर उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। वह अपने काम लगे रहते। यहां तक कि राज्य मंत्री श्री भगवत सरन गंगवार तक से सिफारिश लगवाई। परिणाम यह हुआ कि तत्कालीन सपा सरकार ने इलाज खर्च का लगभग डेढ लाख का चेक प्रदान कर ही दिया। इससे एक लाभ ये भी हुआ कि जो लोग ये कह कर हतोत्साहित कर रहे थे कि एक पैसा भी नहीं मिलेगा, उनके मुंह बंद हो गए और बेमन से ही सही पर उन्हें निर्भय जी की लगन का कायल होना ही पड़ा। मुझे याद आता है उद्योगमंत्री नारायण दत्त तिवारी का जमाना। उस समय वेस्पा स्कूटर ब्लैक में भी आसानी से उपलब्ध नहीं पाता था। निर्भय जी दो पत्रकारों को तिवारी जी के माध्यम से वेस्पा रेट टू रेट दिलवा दिया। इसी तरह शहर में पत्रकारों के लिए प्रियदर्शिनी नगर में आवासीय कालोनी बनवाने में भी निर्भय जी ने महतवपूर्ण भूमिका निभाईं। यह और बात हैे कि निर्भय जी ने काफी मेहनत के बाद भी ‘प्रियदर्शिनी नगर’ में मकान नहीं लिया। जबकि तत्कालीन बरेली विकास प्राधिकारण के उपाध्यक्ष जी डी माहेश्वरी ने दो बार मकानों की तारीख बढ़ाई कि निर्भय जी आप मकान जरूर लें। पर उन्होंने कहा मेरा स्वयं का मकान है और पत्रकारों को मिलने दीजिए। निर्भय जी के विषय में जितना भी याद आता है उसे यदि हूबहू कागजों में उतारा जाये तो एक महाग्रंथ तैयार हो जायेगा। यादें तो पीछ छोड़ नहीं रहीं पर कागज आगे साथ देने को तैयार नहीं है। स्पेस जितना है उतना ही लिखा जाये यह पत्रकारिता के करियर मुझे भी बखूबी सिखा दिया है। इसलिए फिलहाल इतना ही, शेष फिर।
87, शाहबाद चैबे जी की गली, बरेली मो. 9897880701 निर्भय जी एक ऐसा व्यक्तित्व है जिसका कोई सानी नही है।*
बरेली निवासी वरिष्ठ पत्रकार निर्भय सक्सेना जी से मेरी पहली मुलाकात वर्ष 2013 के उत्तरार्ध में फोन पर हुई। यह कहना है
यू. पी. जर्नलिस्ट्स ऐसोसिएशन (उपजा)के प्रदेश महामंत्री रमेश चंद जैन का। इलाहाबाद में होने वाले उपजा के द्विवार्षिक प्रदेश चुनाव में मेरी प्रान्तीय महामन्त्री पद पर उम्मीदवारी होने से वोट और स्पोर्ट मांगा था। उन्होंने सहर्ष स्वीकारोक्ति दे दी। बरेली के ही जनार्दन आचार्य मेरे पुराने मित्र थे। इन दोनों ने संयुक्त रूप से मेरे पक्ष में मोर्चा खोल दिया। इस विषय पर बरेली के पत्रकारों में काफी हलचल मची, पर वे टस से मस नही हुए।
वर्ष 2013 में उपजा के द्विवार्षिक अधिवेशन इलाहाबाद में चुनाव हुआ। प्रदेश भर के जिलों से पँहुचे डेलीगेट्स ने मतदान किया। निर्भय जी ने डेलीगेट्स से संपर्क साधा। अंततः मेरी विजय श्री हासिल हुई। निर्भय जी भी प्रान्तीय उपाध्यक्ष पद पर निर्वाचित हुए।
उसके बाद निर्भय जी और लखनऊ के उपजा जिलाध्यक्ष अरविंद शुक्ला जी के सहयोग से पत्रकार हित में अनेक कार्यक्रम समय समय पर किये गए तथा अनेक मांग पत्र प्रदेश के सूचना विभाग के अलमबरदारों से लेकर मुख्यमंत्री व प्रधानमंत्री को भेजे गए।
निर्भय जी के प्रयासों से बरेली में उपजा की दो दिवसीय प्रदेश सम्मेलन/ कार्यकारिणी का आयोजन बरेली उपजा जिलाध्यक्ष पवन सक्सेना, जनार्दन आचार्य, दिनेश पवन, महेश पटेल, सुभाष चौधरी, फिरासत हुसेन, फहीम करार, कृष्ण राज आदि द्वारा किया गया।
इस अवसर पर एक स्मारिका का प्रकाशन किया गया।
16 मार्च 1966 में स्थापित उपजा का अभी तक कोई अधिकृत इतिहास नही था। इसे संजोने और संकलित करने का बीड़ा निर्भय जी ने उठा लिया। निर्भय जी ने संस्थापक कार्यकारिणी और पदाधिकारियों की जानकारी जुटाई तथा श्रंखलाबद्ध करते हुए उपजा का इतिहास संकलित किया। संस्थापक महामन्त्री भगवत शरण जी के विषय मे उपजा के कथित अलम्बरदार भी कोई जानकारी नही रखते थे।
लेकिन निर्भय जी ने मुझे साथ लेकर अलीगंज लखनऊ में घर-घर, चौखट दर चौखट पूछताछ की और 3 घण्टे के अनवरत परिश्रम के बाद आखिरकार उन्हें तलाश लिया। निर्भय जी और हमने उनके चरणस्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
ऐसा एक नही अनेको उदाहरण है निर्भय जी ने उपजा के पूर्व पदाधिकारियों (अज्ञात) जैसे गुरुदेव नारायण, राजेन्द्र दिर्वेदी आदि के विषय मे जानकारी जुटाई, सम्पर्क किया और उपजा के वर्तमान स्वरूप की चर्चा कर मार्गदर्शन करने का अनुरोध किया। निर्भय जी बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी है। कोई परिस्थिति उत्पन्न हो उनकी पेशानी पर लकीरे नही उभरती थी।
एक मर्तबा प्रदेश उपजा एवं लखनऊ जिला उपजा द्वारा आयोजित मई दिवस 2016 के अवसर पर प्रदेश अध्यक्ष के नहीं पहुँचने से निर्भय जी ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की तथा मुलायम सिंह की छोटी बहू अपर्णा यादव का अभिनंदन कर सम्मानित किया।
मजीठिया वेज बोर्ड लागू करवाने के लिए बने कन्फेडरेशन का दो दिवसीय कार्यक्रम लखनऊ के गोमती होटल तथा विश्वरैया हाल में आयोजित हुआ। निर्भय ने बढ़चढ़ कर भाग ही नही लिया अपितु दो वरिष्ठ पत्रकारों राजेन्द्र प्रभु और नंदकिशोर त्रिखा (दोनों नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट नेता) की पूरी आवभगत और देखभाल की।
श्रम कानूनों को समाप्त करने से रोकने के लिए 10 अक्टूबर 2019 को कन्फेडरेशन (पत्रकार यूनियनों के समूह) द्वारा जन्तर मन्तर पर किये गये धरना- प्रदर्शन में निर्भय जी शामिल ही नही हुए अपितु स्थानीय न्यूज़ चैनल्स को बाइट भी दी।
प्रयागराज कुम्भ 2019 में उपजा ने दल बल के साथ शिरकत की। निर्भय जी उसमें भी पीछे नही रहे।
वें संगठित क्षेत्र के श्रमिकों के हित मे सदैव अग्रसरित रहे।
कर्मचारी राज्य बीमा निगम( ई एस आई सी ) के तहत 8000 रुपये प्रतिमाह तक वेतन वालो को निःशुल्क इलाज की व्यवस्था निर्धारित थी। निर्भय जी ने श्रमिक संघो के साथ मिलकर संघर्ष किया। पूर्व निर्धारित वेतन सीमा दायरा को बढ़वाकर 15000/- कराया। निर्भय जी इससे संतुष्ट नही हुए। अपने एकल प्रयासों से केंद्रीय श्रम मंत्रालय से वेतनसीमा दायरा बढ़वाकर 21 हजार रुपये करा दिया। अभी भी वें अधिकतम श्रमिकों को ई एस आई सी का लाभ दिलाने के लिए 35000/- वेतन दायरा सीमा कराने में जुटे हुए है। ऐसे जीवट वाले इंसान है निर्भय जी।
केंद्रीय स्तर पर मजीठिया वेज बोर्ड लागू करना, पत्रकार सुरक्षा कानून बनाकर लागू करना, प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के संरक्षण के लिए प्रेस कौंसिल की बजाय मीडिया कौंसिल का गठन किया जाना, प्रेस आयोग का पुनर्गठन किया जाना आदि के लिए भी उन्होंने प्रधानमन्त्री से राष्ट्रपति को अनेक पत्र लिखे।
उत्तर प्रदेश में राज्य स्तर पर पत्रकार सुरक्षा कानून बनाए जाने, सभी पत्रकारों को चिकित्सा सुविधा कार्ड देने, सेवा निर्वत वरिष्ठ पत्रकारों को पेंशन शुरू करने आदि मांगो को लेकर केंद्रीय श्रम मंत्री से मुख्यमंत्री और राज्यपाल को अनगिनत पत्र भेजे। यह क्रम आज भी जारी है।
समाज सेवा में भी निर्भय जी पीछे नही है। अभी तक 50 बार ब्लड डोनेशन कर चुके है। मानव सेवा क्लब बरेली के माध्यम से निराश्रितो को भोजन कपड़े फल आदि अक्सर मुहैया कराते रहते है।
निर्भय जी ऐसे व्यक्तित्व के धनी है एक बार जिसके साथ हो गए अपनी तरफ से साथ छोड़ने वाले नही है।बिरादरीवाद, किसी पद प्रतिष्ठा का प्रलोभन आदि भी उन्हें डिगा नही सकता। हमारे बीच अलगाव पैदा करने की अनेक कोशिशें की गयी। सभी निष्फल साबित हुई। 7 वर्ष से हम अभिन्न मित्र है।
वे सादगी से ओत प्रोत और सरल स्वभाव के है। उनके संपर्क में यदि एकबार कोई आया तो वह उन्हें भुला नही सकता।
मैं प्रभु से उनके उत्तम स्वास्थ्य, कर्मठता,परोपकारी जीवन की कामना करता हूँ।
*रमेश चन्द जैन*
प्रान्त महामन्त्री(उपजा)
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