अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बरेली को पहचान दिलाने वाले वसीम बरेलवी को किया सम्मानित
बरेली रूबरू बरेली। अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शायर वसीम बरेलवी की "शख्सियत और शायरी" पर मानव सेवा क्लब के तत्वावधान में एक गोष्ठी में साहित्यकारों और विद्वानों ने विचार व्यक्त किए । वसीम साहब की श्रेष्ठ शायरी पर उनको पगड़ी और शाल पहनाकर सम्मानित भी किया गया। फूटा दरवाजा स्थित वसीम बरेलवी के आवास पर हुई गोष्ठी में क्लब के अध्यक्ष सुरेन्द्र बीनू सिन्हा ने कहा वसीम बरेलवी ने अपनी श्रेष्ठ शायरी से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बरेली को पहचान दिलाई।
इतिहासकार रणजीत पांचाले ने कहा कि आज कम लोगों को पता है कि जाहिद हसन उर्फ वसीम बरेलवी ने अनेक सुंदर गीतों की भी रचना की है। उन्होंने उनके गीतों के भाषाई सौंदर्य पर विस्तार से प्रकाश डाला। वसीम साहब के व्यक्तित्व की विशेषताओं की चर्चा करते हुए रणजीत पांचाले ने कहा कि शोहरत की बुलंदियों पर पहुंच जाने के बाद भी वसीम बरेलवी की विनम्रता और सहजता यथावत बनी हुई है।
नवगीतकार रमेश गौतम ने कहा कि वसीम बरेलवी की शायरी ने देश की सांस्कृतिक धरोहर को बड़ी संजीदगी से संभाला है। उसमें अपनी मिट्टी की खुशबू है। उनकी नेकदिली उनकी शायरी में भी विन्यस्त है।
साहित्य भूषण सुरेश बाबू मिश्रा ने कहा कि वसीम बरेलवी के उच्चस्तरीय सृजन ने उर्दू शायरी की लोकप्रियता की वृद्धि में विशेष योगदान दिया है।
इस अवसर पर वसीम बरेलवी ने अपनी नई ग़ज़ल पढ़ी : *चर्चे हमारे फन के कहां पर नहीं हुए/ लेकिन कभी हम आपे से बाहर नहीं हुए/ अपनी ज़मीं को हमने बनाया है आसमां/ ऊंचे किसी के कांधे पर चढ़कर नहीं हुए/ उड़ने का एक जुनूं था कि मरहम बन रहा/ पथराव कब हमारे परों पर नहीं हुए।* वसीम बरेलवी को कलम बरेली की = 6 का अंक भेट किया गया।
गोष्ठी में इन्द्र देव त्रिवेदी, प्रकाश चंद्र सक्सेना, प्रदीप माधवार, निर्भय सक्सेना, राम कुमार ‘अफरोज,सुधीर मोहन’ ने भी विचार व्यक्त किए। निर्भय सक्सेना
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