बरेली के गौरव थे आर्यसेवक स्वर्गीय डा सन्तोष कुमार कण्व
बरेली रूबरू बरेली। अगर मन में ठान लिया जाये तो कोई कार्य असंभव नहीं है। मनुष्य अपनी मेहनत व दृढ़ इच्छा शक्ति से कोई भी असंभव कार्य करके दिखा सकता है।
ऐसे ही एक व्यक्ति थे ब्रह्मचारी डॉ संतोष कण्व। जिन्होंने अपनी दृढ़ इच्छा से न केवल आर्य समाज की सेवा की थी बल्कि उनके सिद्धान्तों के प्रचार- प्रसार में अपना जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने दैनिक विश्व मानव में भी अपनी संपादकीय सेवा वर्षों दी।
बरेली नगर के घनी बस्ती वाले क्षेत्र चाहबाई ठरा थेरा की एक गली के छोटे से मकान में जगदीश बहादुर रायजादा के परिवार में साध्वी, सरल एवं धार्मिक विचारों से ओत- प्रोत माता श्रीमती विद्या देवी के कोख से जन्में बालक संतोष कण्व बाल्यावस्था से ही ऋषि दयानन्द से प्रभावित थे। वैदिक सिद्धान्तों से ओत-प्रोत रहे।
10 जुलाई 1952 में जन्में ब्रह्मचारी संतोष कण्व ने अपने माता-पिता के सनिध्य मे रहकर बाल्यावस्था में अध्ययन शुरू किया। बचपन से ही तीव्र बुद्धि के थे जिस कक्षा में पढ़ते थे उसके आगे की कक्षा को पढ़ाते भी थे।
इतना ही नहीं ऐसे बच्चों को जिनके पास पुस्तकें नहीं होती थी या धन का अभाव रहता था उनके लिए हर सम्भव सहायता को तत्पर रहते थे। कम बोलना, तर्क युक्त बात कहना तथा गम्भीर स्वभाव उनका प्रारम्भ से ही रहा।
यदि घर या बाहर का कोई व्यक्ति कुछ कह देता था तो मुस्कराकर कहते थे कि मेरा तो कुछ भी नहीं है जो चाहें कह लो। बाल्यावस्था से ही समर्पण की भावना विद्यमान थी।
बचपन में जब उनसे कोई पूछता था कि संतोष तुम क्या बनोगे तो कहते थे कि मैं समाज का हूँ, देश का हूँ तो और क्या बनूँगा। उसी के लिये जीऊँगा उसी के लिए मरूँगा। भावना से समाज, कर्म में देश व समाज सेवा, सिद्धान्तों में वेद व प्रेरणास्रोत थे ऋषि दयानन्द सरस्वती।
शायद इसीलिए बचपन से ही उन्होंने अपने को आर्य समाज के लिये समर्पित कर रखा था और उनका उद्देश्य था कि वैदिक सिद्धान्तों का गहन अध्ययन करके समाज की सेवा में तल्लीनता से समर्पित हो जाये।
माता- पिता के अग्रज पुत्र संतोष कुमार ने जब अपनी युवावस्था में प्रवेश किया तो उनके मन में ज्ञान की विधाओं के अध्ययनकी लालसा प्रारम्भ हो गई। विज्ञान के छात्र होते हुये भी उन्होंने विभिन्न सम्प्रदायों के साहित्य, वेदशास्त्रों, विश्व का इतिहास, विभिन्न भाषाओं का गहन अध्ययन किया।
बरेली कॉलेज से बी.एस. सी. तथा एम.एस.सी. गणित में करके उपरोक्त गणित विषय में बनारस हिन्दू विश्वद्यियालय में रहकर पी. एच. डी. की उपाधि से विभूषित हुये थे। पुनः इसी विश्वविद्यालय में कई वर्ष अध्यापन का कार्य भी किया था।
ब्रह्मचारी संतोष कण्व को समाज की विभिन्न विकृतियों, अन्धविश्वास व समाज सुधार की ललक थी। उन्होंने असहाय असमर्थ दयालु समाज की सेवा का संकल्प लिया और विश्वविद्यालय के सीमित कार्यक्षेत्र को छोड़कर ईश्वर की सम्पूर्ण सृष्टि के उत्थान के लिए कूद पड़े।
इसी बीच माँ का ममत्व व पिता का लालन एवं दायित्व की भावना ने उनको पुनः उत्साहित किया, तो पंत नगर विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य में पुनः लग गये, लेकिन मन अत्यन्त विचलित रहा।
इसी बीच विभिन्न धर्मशास्त्रों का पुनः गम्भीरता से अध्ययन, महापुरुषों की जीवन गाथायें। महर्षि दयानन्द व वैदिक सिद्धान्तों का गहन अध्ययन प्रारम्भ कर दिया। सभी धर्मावलम्बियों के वास्तविक ज्ञान के लिए तल्लीनता से लग गये।
महर्षि अरविन्द घोष, रामकृष्ण परमहंस, आचार्य रजनीश आदि के साहित्यों का भी गम्भीरता से अध्ययन किया था। उनकी दृष्टि में ऋषि दयानन्द का वैदिक साहित्य, वैदिक चिन्तन ही राष्ट्र व समाज को श्रेष्ठ मानवीय उत्थान का संदेश दे सकता है।
डॉ संतोष कुमार कण्व वैदिक सिद्धान्तों को जन- जन में प्रसारित करना चाहते थे। माता- पिता ने युवा संतोष के विवाह की उत्सुकता दिखाई तो उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि नश्वर शरीर आर्य समाज के लिये समर्पित है तथा ऋषि दयानन्द के जीवन का ही अनुसरण करेगा। इसलिये उन्होंने बाल ब्रह्मचारी होने का व्रत लिया।
पंत नगर विश्वविद्यालय का कार्यक्षेत्र छोड़कर सर्वप्रथम बरेली में मूर्धन्य विद्वान आचार्य विश्वश्रवाः व्यास व प्रकाण्ड विद्वान शास्त्रार्थ महारची पं बिहारी लाल शास्त्री, माता वेदभारती सावित्री देवी, वेदाचार्य के सम्पर्क में आये।
उन्हीं की प्रेरणा से आर्यसमाज के उत्थान य प्रचार- प्रसार के लिये समर्पित होगये। इसके बाद स्व श्री भद्र गुप्त ने (डाबर वाले), स्व जगदीश शरण आर्य (तोपखाने वाले) व पं रामप्रसाद मिश्र आदि के अत्यन्त आग्रह पर आर्य समाज के प्रचार- प्रसार के लिये आर्यसमाज बिहारीपुर, बरेली को केन्द्र बनाया।
अब क्या था घर छोड़ व भौतिकतावादी सुखों से दूर सम्पूर्ण देश के काने- कोने में प्रचार-प्रसार के लिये गतिविधियां प्रारम्भ कर दी। आर्य समाज बिहारीपुर की प्रत्येक गतिविधियों का निर्देशन, चाहे वार्षिकोत्सव हो, वेद- प्रचार सप्ताह या चाहे रामगंगा मेला हो या होली मिलाप सभी में आर्य संमाज के प्रचार के लिये तल्लीनता से लग जाते थे। शुद्धि के कार्य में भी स्वर्गीय संतोष कुमार कण्व ने अग्रणी भूमिका निभाई थी।
वैदिक सिद्धान्तों से भ्रमित लोगों को अपने घर पुनः लाने की उनमें अद्भुत कला थी। उनको प्रचार-प्रसार की ललक थी, वह अक्सर कहते थे कि धन तो ईश्वर देता, धर्म के काम में धन की कमी नहीं होती है। सिद्धान्तों का प्रचार होना चाहिये, जिससे समाज में धार्मिक चेतना बनी है।
डॉ संतोष कण्व राष्ट्रीय स्तर के महान व्यक्तित्व थे। जिन्होंने जीवन भर भौतिक सुखों से दूर, ब्रह्मचर्य का पालन कर वेदप्रचार के लिये समर्पित कार्यकर्ता थे। उन्होंने समाज व राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने कर प्रयास किया लेखन शैली से समाज को नवीन चेतना प्रदान की थी।
जगह-जगह आपके दार्शनिक, साहित्यक, ऐतिहासिक व्याख्यानों से परिवारों को बदलता देखा गया है।
डॉ संतोष कण्व की विशेषता थी कि ग्रामीण अँचल में प्रचार सर्वाधिक किया था। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक आर्य समाज में स्थापना भी की थी। उनके आदर्शों का अभी भी पालन कर रहे हैं, उनकी स्मृतियाँ, उन आदर्शवान अनेक परिवारों में झलक रही है।
डॉ संतोष कुमार कण्व ने लेखन व प्रकाशन का भी कार्य किया है। वैदिक सिद्धान्तों पर आध तारित अनेकों प्रेरणास्पद पुस्तकों का प्रकाशन किया और उन पुस्तकों पर कहीं भी अपने नाम का उल्लेख नहीं करते थे और प्रकाशित करके निःशुल्क बांट देते थे।
वैदिक सामान्य ज्ञान, उर्दू क्यों लाओ, लालपरी आदि लघु पुस्तके लिखी थीं। इसके अतिरिक्त साम्प्रदायिकता, कारण और निदान, मन्दिरों का औचित्य, वैदिक वाङ्गमय पर पाश्चात्य का भ्रम और हम, उत्तर प्रदेश को द्विमाषी सूत्र मत बनाओ, उर्दू की आड़ में पृथकतावाद को बढ़ावा, उर्दू को अपने घर में रुसवा मत करो आदि लेख प्रकाशित हुये थे जो देश भर में चर्चा का विषय बने थे।
उन्होंने सृष्टि विज्ञान नामक पुस्तक का सम्पादन भी किया था।
उनके अनेक विभिन्न विषयों पर लेख एवं कवितायें आर्य जगत को विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं आर्यजगत, सार्वदेशिक, राजधर्म, आर्यमित्र, गान्डीवम्, परोपकारी, आर्य सन्देश, अमर उजाला, दैनिक जागरण, विश्व मानव आदि में प्रचुर मात्रा में प्रकाशित हो चुके हैं।
स्वर्गीय डॉ संतोष कुमार कण्व बरेली के अतिरिक्त देश की विभिन्न संस्थाओं से भी सक्रियता से जुड़े रहे। आर्य समाज बिहारीपुर के सदस्य रहते हुये महत्वपूर्ण कार्यों का सम्पादन करते थे, उन्हीं की योजनाओं के अनुसार बिहारीपुर आर्यसमाज की गतिविधियों के द्वारा वैदिक सिद्धान्तों का प्रचार- प्रसार होता था।
आर्य समाज बिहारीपुर बरेली से सम्बन्धित आर्य समाज अनाथालय की सेवा में भी तल्लीनता से तत्पर रहते थे। वहाँ के अनाथ बच्चों में इतना घुले मिले थे कि जैसे वे ही उन बच्चों के माता- पिता हों, उनकी आवश्यकता के लिये अपनी दाक्क्षणिक आय से पूरा करने के लिये तैयार रहते थे।
अन्तिम समय तक अनाथालय के विकास की चिन्ता उनके हृदय में थी। वह आर्य उप प्रतिनिधि सभा के भी सक्रिय कार्यकर्ता थे। उनके अनुसार जिला सभा प्रचार- प्रसार का कार्य करती थीं। ग्रामीण अंचल में जिला सभा के द्वारा उन्होंने अत्यधिक प्रचार किया था तथा बरेली जिले में अनेक ग्रामों में आर्य समाज की स्थापना भी की थी।
जो आज सक्रिय व गतिशील है। आर्य प्रतिनिधि सभा उ प्र व सार्वदेशिक सभा के कार्य कलापों में भी उनकी सक्रियता थी।
अन्तर्राष्ट्रीय विख्यात आर्य सन्यासी स्वामी अग्निवेश एवं पूर्व सांसद स्व स्वामी इन्दवेश की गतिविधियों में भी उनकी सदा सहभागिता रहती थी।
स्वामी अग्निवेश की मासिक पत्रिका राजध र्म का सह- सम्पादन का कार्य आपके द्वारा ही होता था बल्कि पूरी पत्रिका का प्रकाशन आपके निर्देशन में ही होता था।
स्वर्गीय डॉ सन्तोष कण्व एक राष्ट्रीय स्तर के कर्मठ विद्वान थे। स्पष्ट वक्ता, प्रखर उपदेशक तथा भयरहित चिन्तन को समाज के समक्ष रखते थे। वैदिक समाजवाद के समर्थक थे।
गुण- कर्म स्वभाव की सामाजिक व्यवस्था के पक्षधर थे। वेदों की विचारधारा के सम्पोषक एवं वैदिक एकरूपता के समाज की कल्पना उनके मस्तिष्क में विद्यमान थी, इसी प्रयास में उन्होंने अपना सर्वस्व जीवन समर्पित कर रखा था। अन्तिम क्षणों में अस्वस्थ रहते हुए, वैदिक सिद्धान्तों के प्रचार की चिन्ता प्रतिपल सताती रहती थी।
लोगों से मिलना, उन्हें आर्य समाज की व्यवस्थाओं के विषय में बताना। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उन्हें शायद अभास हो रहा है कि परमपिता परमेश्वर से साक्षात्कार होने वाला है।
मृत्यु से पूर्व राजधर्म में उन्होंने एक लेख में लिखा भी था कि मेरी मृत्यु इच्छानुसार ही होगी। जब कभी भी उनसे कोई पूछता था कि संतोष कुमार आपका स्वास्थ्य कैसा है तो प्रसन्नतापूर्वक कहते थे कि अब तो पहले से काफी सुधार है। उन्होंने अपने कष्टों का किसी को भी अनुभव नहीं होने दिया।
प्रतिपल उनके स्वास्थ्य में गिरावट चिन्ता का विषय बन रही थी। आर्यसमाज के पदाधिकारी उनके स्वास्थ्य लाभ के लिए प्रयत्नशील थे परन्तु परमेश्वर के विधान ने उन्हें अल्प अवस्था में ही आर्य समाज के एक योग्य, कर्मठ, निर्भीक, वैदिक विचारधारा के पक्षधर ब्रह्मचारी को 30 मई 2002 की ब्रह्ममुहूर्त में सदा के लिए परमेश्वर की व्यवस्थाओं में समर्पित कर दिया।
उनका प्रत्येक वाक्य, लेखनी का एक-एक शब्द मानव जीवन को श्रेष्ठ मार्ग पर चलने का सन्देश दे रहा है। उनकी कविताओं के भाव संसार की वास्तविकता का आंकलन कर रही है। उनकी लेखनी का अन्तिम पड़ाव उन्हीं की निम्न कविताओं में दृष्टिगोचर हो रहा है -
वक्त कटता गया उम्र घटती गयी, जिन्दगी यूँ ही सारी गुजरती गयी।
कब सुबह हो गयी दिन का सूरज चढ़ा, शाम होकर निशा भी विदा हो गयी। दिन महीने बरस बीतते ही गये, नींद ही नींद में हवा हो गयी।
जिस पर मरता गया रात- दिन तू यहाँ, सारी दुनियाँ यहीं की यहीं रह गयी। चलते-चलते थमा तू नहीं था मगर, साँस चल- चल के एक दिन स्वयं थम गयी ।। 2 ।।
अब रहा हाथ क्या देह धरती पे है, चार काँधों पर चढ़के चलेगा अभी। चुन चुकी है चिता उस पर लेटेगा तू, और धू धू के काठी जलेगी अभी
।।3।।
सब खिलौने हैं तू खेल ले शौक से, देह माटी की माटी में मिल जायेगी। कब दिया साथ किसने बता दे यहाँ, पोल रिश्तों की एक दिन खुल जायेगी ।।4।।
वक्त रहते संभल जा तभी ठीक है, बाद में हाथ कुछ भी बचेगा नहीं। सब गंवा दी जो पूँजी यों ही खेल में, चोला मानव का जल्दी मिलेगा नहीं।।5।।
= डॉ श्वेतकेतु शर्मा, पूर्व सदस्य हिन्दी सलाहकार समिति भारत सरकार, पूर्व मंत्री आर्य समाज बिहारीपुर व आर्य समाज अनाथालय , बरेली
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